#बंगला_मैथिली 

बंगला मैथिली अनुवाद

‘बउड़िक दोकानक एक दिन’

चाहक एक अति साधारण दोकान। नाम ‘बउड़िक टी शॉप’।

बीझ लागल टीनक साइनबोर्ड परहक नाम मेटा गेल  छै, तैयो लोकक मुँहें मुँहें ओ नाम रहिए गेल छै। 

एतबे नै ऐ दोकानक अनेकों ‘उपनाम’ सेहो भेटि गेल छै। केओ केओ एकरा ‘बउड़िक टी स्टॉप’ कहै छै। बस स्टॉप लग छै ने तें ई नामकरण। 

किछु गोटे एकर नाम ‘बउड़िक टी चप’ सेहो धेने छै। चाहक संगे च’प सेहो रखै छै ने, तें। 

मज़ाक में कत्तेक गोटे त’ एकर नाम ‘बउड़िक टी शव’ सेहो ध’ देने छै। रास्ताक कातक अस्वास्थ्यकर परिवेश, मैल आ चाह पत्तिक जड़ल अंश जमल चाह वला बर्तन, संगे च’पक लोहिया में दोकानक सृष्टिक समय सँ भरल गेल तेल में छानल गेल च’प। पाचनतंत्रक 'पचन' प्रक्रिया के अत्यन्त त्वरित करए बला चाह आ च’प खूब सहजहि ककरो ‘डेडबॉडी’ अथवा ‘शव’ में परिणत करबा में सक्षम। एहि कल्पनाशक्ति सं सम्पन्न व्यक्ति सबहक देल ई नाम।

मुदा ‘पलाशपुर’ निवासीक लेल 'बउड़िक दोकानक’ आकर्षण अनन्य छै। एहि दोकान सँ सटल बृद्ध पीपरिक गाछक छाँह में दूटा लकड़ीक बेंच राखि देने छै ‘बउड़ी’ आ तै पर बैसते देरी मस्त ‘बैसकीक’ निशा चढ़ि जाई छै लोक सभ पर। 

यैह परिवेश गामक लोक के आकर्षित केने रहै छै। साँझ-भिनसर एहि ठाम ‘बैसकी’ जमल रहै छै। आ एक विस्वस्त सेवादार जकाँ ‘बउड़ी’ सबके चाह पहुँचबैत रहै छै। कखनो-कखनो बिस्कुट-तिसकुट, च'प आदि इत्यादि सेहो।

भिनसरका ‘बैसकी’ में विशेष क' इलाकाक वयोवृद्ध लोकनि रहै छथिन्ह। बृद्ध लोकनिक समस्याजर्जरित जीवन। हुनका लोकनिक ‘बैसकीक’ एकटा अलगे परिवेश रहै छन्हि। अम्ल–पित्त, बात, वायुविकार, शर्करा (sugar) बृद्धि, रक्तचाप आदिक अतिरिक्त विभिन्न पारिवारिक झंझटि। काज केनिहारि दाई छुट्टी लेने छन्हि, पुत्रीक योग्य वर नहि भेटि रहल छन्हि। भेटतो छन्हि त’ दहेज बेसी, किराएदार बढियाँ नै, बेटा बात-कथा कहि दैत छन्हि इत्यादि... समस्याक अंत नै। अप्पन व्यवसाय करैत ‘बउड़ी’ कान पथने ई गप्प शप्प सुनैत रहैत अछि।

बड्ड चालू दोकान ‘बउड़ीक’। स्थानीय लोकक संग बाहरी क्रेता सेहो बहुत। ओकर दोकान लग दिन में दूटा दूरगामी बस ठाढ़ होई छै। 

ओई दिन दुपहरियाक बस सँ एक शहरी युवक उतरलै। उमेर कत्तेक हेतै? वैह मोटामोटी 28-30। हाथ में एकटा ट्रॉली बैग, पीठ पर लैपटाप बैग। देखले सँ बुझना जाई छलै जे ई ईलाका ओकरा लेल नव छै। चारु-दिस अखियासैत युवक दोकान दिस बढि एलै। दोकान लग आबि ‘बउड़ी’ के एकटा चाह बनेबाक लेल कहि, पुछलकै, 

- “अच्छा लग पास में कोनो होटल छै?”

- “होटल? हँ, से त’ छैहे। मेन रोड दिस आगू बढला सँ होटल भेटि जायत बाबू।”, 

हँसी मुहें ‘बउड़ी’ कहलकै। आ फेर पुछलकै, 

-“एम्हर पहिल बेर एलियै ये कि बाबू?”

युवक कनी हँसि सहमति में मुड़ी डोलाक’ बजलै। 

-“हम बैंक में नोकरी करै छियै। एहि ठाम ‘ट्रान्सफर’ भए के आयल छी।”

-“अच्छा! त’ होटले में रहबै की?”

-“हूँ, जखन धरि भाड़ाक डेरा नहि भेटि जेतै,” चाहक चुस्की लैत बजलाह युवक।

युवकक बात सुनिते ‘बउड़ी’ के सोमनाथ बाबूक गप्प मोन पड़ि गेलै। सोमनाथ राय बूढ़ लोकनिक बैसकीक ‘मध्यमणि’ छथिन्ह। बुरहा-बुरहीक छोट परिवार। एक मात्र पुत्र दिल्ली रहैत छन्हि। किछुए दिन पहिने ऊपर में एकतल्ला बनेलखिनहें। उपरका तल्ला भाड़ा में देबाक इच्छा छनि। 

ई गप्प ‘बउड़ी’ आईए भिनसर बृद्ध लोकनिक ‘बैसकी’ में सुनने रहए। तें उपकरिए क’ पूछि बैसलै,

-“अहाँ के डेरा चाही की?”

-“किएक? अहाँक नजरि में अछि की कोनो?”

-“हँ छै त’। यदि अहाँक ईच्छा हो त’ देखा देब।”

सुनि युवक तुरन्त राजी भए गेल। ओकरो एकटा डेरा लेनाई आवश्यक रहै। सेहो जत्तेक जल्दी भेटए ततेक मंगल। आर अपरिचित स्थान पर अनचिन्ह गाम में केओ सहायताक लेल प्रस्तुत भेल छथि, हुनकर अपमान केनाइओ उचित नहि। ई सोचि युवक ‘बउड़ीक’ सङ्गे डेरा देखबाक लेल विदा भेल।

पूरा खापे-खाप मिल गेलै। युवक के एकदम स मोन पसन्द डेरा भेटि गेलैक। आ सोमनाथ बाबू सेहो मन-पसन्द भडैता पावि खुशी। आ ई उपकार कए ‘बउड़ी’ सेहो तृप्त।

ओहि दिन साँझ में चुल्हि पजारैत काल ‘बउड़ीक’ नजरि विजन मास्टर पर पड़लै। ओ सान्ध्यभ्रमण लेल निकलल छलाह। किदन सोचि ‘बउड़ी’ सोर पाड़लकनि, “ओ मास्टर मोशाई, शुनछेन?”

विजनमास्टर घुरि क’ पुछलकनि “किछु बोलबी बउड़ी?”

विजनमास्टरक वयस बेसी नय। खूब बेसी त’ साठि-बासठि।

बेटीक विवाह लेल खूब चिंतित रहय छथि एखन। वरक लेल फिरिसान भेल फिरैत छथि मुदा कोनो उपयुक्त लड़का भेटि नहि रहल छन्हि। आई भिनसरका ‘बैसकी’ में हुनका मुँहें यैह दुश्चिंताक गप्प निकलि रहल रहनि। 

‘बउड़ी’ फुसफुसा क’ कहलकनि, 

-"मस्टरमोशाई’ कोनो गलत बात कही त' कहल सुनल माँफ करब। एकटा बात आएल रहए मोन में।”

-“की बात, कह नें।” माथ घोकचिया कए पुछलखिन विजनमास्टर।

-“ नै, माने, सोनादीदीमुनी लेल एकटा लड़का अछि हमरा नजरि में।”

-“लड़का! तोरा नजरि में? तोरा केना आ कतए भेट गेलौ रौ।” स्वाभाविक! खूब अवाक ओ उत्सुक रहथि विजनमास्टर।

‘बउड़ी’ तखन ओई नवागंतुक युवकक सम्पूर्ण विवरण देलकनि हुनका।

तखनहिं विजनमस्टरमोशाई क आँखि में आशालताक सँचार भए एलनि। लड़काक संबंध में जत्तेक जानकारी भेटलनि ताहि अनुसार खूब नीक बुझेलनि। बैंकक नौकरी। जखन बदली भए आएल छै तखन त’ निश्चित रुपें ऑफिसरेक पद पर हेबाक चाही। आ बाँकी सब बातक त’ सोमनाथ बाबूक ओहिठाम जा लड़काक संगे बात केला सँ भाँज लागिए जेतै।

बउड़ीकें धन्यवाद दय विजनमास्टर आओर एक्को रत्ती विलम्ब नहिं कएलनि। उठि ठाढ़ भेलाह। मोन भेलनि जे एखने एक बेर सोमनाथबाबुक ओहिठाम सँ भए आबी। 

विजनमास्टरक उठि के गेलाक कनिए कालक बाद दीपक दास दोकान पर पहुँचलाह।  बउड़ीके एक कप चाह देबाक लेल कहि बेंच पर उदास भेल बैसि गेलाह। बउड़ी चाह दैत पुछलकनि,

-“दादार शरीर ठीक आछे तो?”

दीपक दीर्घनिस्वास छोरैत बजलाह,

-“ हँ भाई, शरीर त’ ठीक छौ मुदा बौआ के लेल बड्ड चिंता में छी।"

-“कत्तेक बयसे भेल आहाँक बौआक, जे ओकरा लेल एखने सँ एत्तेक चिंता में पड़ि गेल छी?

-“की कहिय’, बौआक लेल कोनो मास्टरे नै भेट रहल छै। गणित में बड्ड कमजोर भ’ गेल छै ओ। ऐही साल मैट्रीक परीक्षा देतै, मुदा जानि ने की हेतय!”

-“किएक दादा, कत्तेक बच्चा त’ बस सँ शहर में ट्यूशन पढ़बाक लेल जाई छै, देखैते रहै छियै।”

-“से त’ ठीके जाई छै, मुदा हमर बौआ बड्ड दुब्बर आ कमजोर छै ने। एनाई-गेनाई ओकरा बुत्ते पार नै लगतै। आ लग-पास में कोनो तेहन मास्टरो नै भेटै छै। महा समस्या में पड़ि गेल छी हौ।”

क्षणे में ओ युवक मोन पड़लै बउड़ी के। 

-“यौ! हमरा नजरि में एक गोटे एहन छै। एहि ठाम न'व छै। मुदा जानि ने ओ पढ़ा सकतै कि नै।“

दासबाबू बउड़ी दिस तकलाह। बउड़ी कहलकनि। 

-“सोमनाथ कक्काक नवका भरैता दादा। नाम, सौमेन। सौमेन चटर्जी। आइए अयलै य। खूब पढ़ल-लिखल छै। सोमनाथ कक्का के कहैत रहै त’ सुनलियै। ओना हम त’ एत्तेक नै बूझै छियै। अहाँ एक बेर पता लगा सकै छी।“

दीपक दास के जेना हाथे-हाथ स्वर्ग भेटि गेल होइन। बिना कोनो देरी केने सोझे सोमनाथ बाबू ओहिठाम विदा भेलाह।

साँझ खन बउड़ीक दोकान में खूब भीड़ रहै। भरि पलाशपुर में ओकर च’प विख्यात रहै। दिने में सब सरंजाम तैयार क’ क राखि लै बउड़ी। बेसन घोरि, च’पक मसल्ला तैयार के' आ 'बिस्कुटक गुड़ा' में लपटि क' राखि लै। साँझ में छानि के' राखल तेल में गरमा-गरम छानि दै।

संगीतक क्लास खतम कए आपस होइत काल 'सोनाली' 'बउड़ीक' दोकान में एलै। बिजनमास्टरक बेटी। भीड़ में सँ मूड़ी उठा क' बउड़ीके च'पक ऑर्डर दैत काल सोनालीक नजरि सौमेन पर पड़लै। सौमेन दोकानक एक कात में ठाढ़ भए चाह पीबि रहल छलै। 

एक त' इलाका में नव आ देखबा में सुपुरुष, आँखि में बसि जाय योग्य मुखाकृति। सोनालीक नजरि अटकि जकाँ गेलै। कनखी सँ सौमेन के देखि रहल रहै सोनाली। एक बेर अकस्मात दुनू गोटेक नजरि टकरा गेलै। सोनाली तत्खनात अप्पन नजरि हटा लेलकै। तखने ठोंगा में च'प दए आ ऊपर सँ बिटनून, कचल खीरा, कचल प्याजु दए बढ़ा देलकै बउड़ी। दोकान सँ निकलबा काल एक बेर सोनाली ओइ दिस नजरि देलकै। फेर एकबेर आँखि लड़ि गेलै। सौमेन अपलक सोनाली के देखि रहल रहै। गाल पर गुलाबी आभा, ठोड़ पर स्मित हास्यक संग, तेज गति सँ अपना घर दिस बढ़ि गेलै सोनाली।

बउड़ीक दोकानक एक दिनक वृत्तान्त एतहि समाप्त कएल जा सकै छलै। मुदा सोमेनक मोनक अवस्था बिना बुझने ई 'गल्प' असमाप्त ने रहि जेतै। तें 'उपसंहार'क लेल सौमेनक डायरिक पन्ना पर नजरि देब आवश्यक।

'पालशपुर में आई हमर प्रथम दिन। कलकत्ता सँ एहन छोट सन गाम में हमर बदली। मोन एनाही नीक नै लागि रहल रहय। ताहि पर सँ एतुक्का लोक सब.... अत्यन्त कौतुहल सँ ग्रस्त जबरदस्ती बात बात में टाँग अरेबा में पटु। 

एबाक सङ्गे संग विजन बनर्जी नामक एक व्यक्ति आबि परिचय-पात करय लगलाह। परिचय-पात की, एक इंटरव्यू कहनाय उचित। वंशपरिचय, मूलगाम, गोत्र, शैक्षणिक योग्यता एतबे नहि हमर पिताक पूरा जन्मकुंडली लए बैसि गेलाह। संगे अप्पन पुत्रीरत्नक गुणकीर्तन सेहो करबा में कोनो भाँगठ नहि रखलाह। बुझा त' रहल छल जे परिचय-पात नहि पुत्रीक लेल लड़का देखए आयल होथि। असह्य भए गेल रहय।

घन्टाभरि बोर कए हुनकर गेलाक संगहि पहुँचि गेलाह एक माध्यमिक छात्रक पिता। ओह ओहो एक अजबे लोक। गप्प नहि सप्प नहि पहिले परिचय में सोझे अप्पन पुत्र के पढेबाक लेल तेहन गहिया के' पकडलनि जे...! 'की अद्भुत जायगा रे बाबा!'

मुदा किछु नीको बात भेल आई। अबिते अबिते एकटा नीक डेरा भेटि गेल। मकानमालिको नीक लोक। एकरा लेल हम ओइ चाह दोकानक भद्रलोकक चिरकृतज्ञ रहबनि। साँझखन ओइ दोकान पर गेल रही। खूब भीड़ रहय तखन। लग-पासक लोक हमरा तेना ताकि रहल छल जेना हम कोनो अजीब प्रकारक जन्तु होइ। जेना हम एखने चिड़ियाखाना सँ भागि आएल होइ।

आर कोन उपाय? नोकरीक बाध्यता। आगामी 2-3 वर्ष त' एहि निर्वासन के लेल बाध्य, अगत्या एहि परिवेश के मानि के चलहे पड़त। ओइ माध्यमिकक छात्र के पढेनाईए ठीके रहत। ने त' ऑफिस सँ एलाक बाद एहि अपरिचित गाम में समय काटब कठिन भए जायत। 

आ एकटा नीक समाचार सेहो छै! गहींर अन्हार में प्रकाशक एकटा 'किरण' देखायल अछि। आ ओइ 'किरण' के लेल ई पालशपुर त की "जहन्नुमो" में रहबाक लेल राजी छी हम। नजरि पड़ल रहय ओहि चाहक दोकान पर। च'प किनबा लेल आयल रहै। गुलाबी रंगक मुखमण्डल ताहि पर गुलाबी सलवार! टान-टान बदामी आँखि। की कटाक्ष रहै ओइ आँखि में। तेहने मधुर कंठस्वर। तेहन स्वर रहै च'प लेबाक लेल.... जेना सितारक मधुर स्वर झंकृत भ' गेल होई। आ! हा!! मोन त' होइ छल जे नोकरी छोड़ि च'पक दोकान खोलि ली। ओहो त' हमरे देखैत रहय, जेना पॉकेटमारक सन्देह में केओ ककरो दिस ताकै छै, तहिना। दु बेर त' नजरि सेहो टकरा गेल रहै। मुदा ओतबे। परिचय नहि भेलै। नामक पता नै। कतए रहै छै सेहो नहि बुझल। मुदा छोट जगह छै। खोजि लेबनि की। ताबे ओइ 'च'पविलासिनिक' नाम "किरण" देल जाय। स्वजन वर्जित एहि 'पाड़ा-गामक' जीवन में वैह भेलीह हमर आशाक एकमात्र 'किरण'।

पाठक लोकनि, बूझिए रहल छियै खिस्सा एतहि खतम नहिं बल्कि एक नव खिस्साक भूमिका मात्र ई।

प्रस्तुत गल्पक लेखिका छथिन्ह 

सुष्मिता नाथ

24.05.2020 क' ई मूल बंगला में आएल रहय हुनकर फेसबुक पर।

अनुवाद हमर

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