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व्यस्त समय में कैसे पढ़ें पुस्तकें

 व्यस्त समय में कैसे पढ़ें पुस्तकें शायद 2017 की बात है! गाँव गया था रामायण की कथा आयोजित थी। इंद्र-पुत्र जयन्त वाला प्रसंग चल रहा था...  सीता चरन चोंच हति भागा।  मूढ़ मंदमति कारन कागा॥ चला रुधिर रघुनायक जाना।  सींक धनुष सायक संधाना॥ कथा वाचक ने विस्तार देते हुए रामचरितमानस एवं बाल्मीकि रामायण में उधृत प्रसंग का वर्णन किया। मेरी जिज्ञासा इस हद तक बढ़ी की मैने मूल बाल्मीकि रामायण पढ़ने की ठानी। मुख्य समस्या 'समय' की थी। क्योंकि 10 से 7 की नौकरी। कार्यालय जाने के रास्ते में 1 घण्टा और 1 घण्टा आने में।  इसके उपरान्त अन्य दैनिक कार्य के संग व्हाट्सएप्प, फेसबुक, इंस्टाग्राम तथा अन्य कार्यों में व्यस्तता के कारण असम्भव ही लग रहा था। लेकिन जिज्ञासा एवं रुचि का स्तर इतना अधिक बढ़ चुका था कि बेचैनी समाप्त ही नहीं हो रही थी। फिर एकाएक दिमाग की बत्ती जली और ऑफिस आने जाने के समय को पठन पाठन में उपयोग करने का निर्णय लिया। सर्वप्रथम "वाल्मीकि रामायण" के पीडीएफ version डाउनलोड किया और लगभग डेढ़ वर्ष लगे आद्योपान्त पढ़ गया। (समझ भी गया इस का दावा नहीं कर रहा हूँ😊) बाद में अमेजॉन किं...
 #बंगला_मैथिली रिजल्ट ई गल्प आई फेसबूक पर एक गोट बंगला पेज “बांग्लाय लेखालेखी” पर भेटल छल। एकर लेखक छथि श्री सुरोजीत घोष। प्रस्तुत केने छलीह ‘श्रीमती सास्वती बासुरायचौधुरी’। गल्प नीक लागल त’ एकरा मैथिली में अनूदित करबाक धृष्टता कए रहल छी। चिकन रोल खेबाक जिद्द पकड़ि लेने छलै ओ बच्चा। माय कीनतै नै, आ बच्चा सेहो एक दम सँ अरबद्धल, बिना कीनेने छोड़तै नै।  बच्चाक बयस कत्तेक हेतै, वैह 10 या 11 बरिस। पीठ पर स्कूल बैग, संभवत: बच्चा पचमा में पढैत हेतै।  हमहूँ रेस्टोरेन्टक आगू में ठाढ़ चिकन रोल खाइत ओइ माय-बेटाक क्रिया-कलाप देखि रहल रही। बच्चा अप्पन जिद पर अड़ल। कहलकै, -चिकन रोल कीन देबही कि नै से कह? माय खिसिया क’ कहलकै, -तोरा लाज होई छौ कि नै? एहन खराब रिजल्ट के बादो कहै छिही चिकन रोल खाएब? चल घर, ‘तोरा बाबा’ (बंगला में पिताजी के ‘बाबा’ कहल जाय छै) के सब गप्प कहै छियौ आई। माय किएक नै किनैत रहै सेहो बुझबा में आबि गेल रहय। स्कूल केर वार्षिक परीक्षा केर रिजल्ट नीक नै भेल रहै बच्चाक, सएह कारणे माय खिसियाएल रहै। जे से, माएक बात सुनि बच्चा कहलकै, - से तोरा बाबा के जे कहबाक हौ से कही गे, मुद...
 #बंगला_मैथिली  बंगला मैथिली अनुवाद ‘बउड़िक दोकानक एक दिन’ चाहक एक अति साधारण दोकान। नाम ‘बउड़िक टी शॉप’। बीझ लागल टीनक साइनबोर्ड परहक नाम मेटा गेल  छै, तैयो लोकक मुँहें मुँहें ओ नाम रहिए गेल छै।  एतबे नै ऐ दोकानक अनेकों ‘उपनाम’ सेहो भेटि गेल छै। केओ केओ एकरा ‘बउड़िक टी स्टॉप’ कहै छै। बस स्टॉप लग छै ने तें ई नामकरण।  किछु गोटे एकर नाम ‘बउड़िक टी चप’ सेहो धेने छै। चाहक संगे च’प सेहो रखै छै ने, तें।  मज़ाक में कत्तेक गोटे त’ एकर नाम ‘बउड़िक टी शव’ सेहो ध’ देने छै। रास्ताक कातक अस्वास्थ्यकर परिवेश, मैल आ चाह पत्तिक जड़ल अंश जमल चाह वला बर्तन, संगे च’पक लोहिया में दोकानक सृष्टिक समय सँ भरल गेल तेल में छानल गेल च’प। पाचनतंत्रक 'पचन' प्रक्रिया के अत्यन्त त्वरित करए बला चाह आ च’प खूब सहजहि ककरो ‘डेडबॉडी’ अथवा ‘शव’ में परिणत करबा में सक्षम। एहि कल्पनाशक्ति सं सम्पन्न व्यक्ति सबहक देल ई नाम। मुदा ‘पलाशपुर’ निवासीक लेल 'बउड़िक दोकानक’ आकर्षण अनन्य छै। एहि दोकान सँ सटल बृद्ध पीपरिक गाछक छाँह में दूटा लकड़ीक बेंच राखि देने छै ‘बउड़ी’ आ तै पर बैसते देरी मस्त ‘बैसकीक’ निशा चढ़ि जाई...